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सेक्युलर राग के लिए धरना



डॉ दिलीप अग्निहोत्री
आईपीएन। कांग्रेस व कम्युनिस्ट पार्टियों की सेक्युलर राजनीति वोटबैंक पर केंद्रित भी। बाद में सेक्युलर के दावेदार अन्य पार्टियां भी इसी का अनुसरण करने लगी। बंगाल में ममता बनर्जी ने तो कांग्रेस व कम्युनिस्ट के खंडहरों पर ही अपनी सत्ता का महल बना लिया। यहां से सब कुछ वैसा ही चलता रहा,जो उन्हें विरासत में मिला था। इसके अनुसार हिन्दू शब्द साम्प्रदायिक हो गया। इस आधार पर हिंदुओं के धार्मिक जुलूस प्रतिबंधित किये जा सकते थे। अन्य मजहबों ने नहीं। बंगाल में इसका प्रत्यक्ष प्रमाण था। तब वहां के उच्च न्यायालय ने कहा था कि उत्तर प्रदेश में दुर्गा मूर्ति विसर्जन व अन्य आयोजन एक साथ हो सकते है,तो बंगाल में ऐसा क्यों नहीं हो सकता। इसी मानसिकता के अनुरूप ममता बनर्जी ने चुनाव सभा में मुसलमानों से तृणमूल कांग्रेस को वोट देने की अपील की थी। उनकी राजनीति के हिसाब से यह कथन सेक्युलर था। लेकिन चुनाव आयोग ने इसे साम्प्रदायिक माना। ममता बनर्जी पर चौबीस घण्टे प्रचार ना करने का प्रतिबंध लगाया। इसके विरोध में ममता बनर्जी ने धरना दिया। जबकि चुनाव आयोग ने उनके साम्प्रदायिक बयान के आधार पर की थी। भाजपा का कहना था कि ममता बनर्जी ने सांप्रदायिक आधार पर वोट मांगने का काम किया। उनके इस बयान को लेकर बीजेपी नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने चुनाव आयोग से ममता की शिकायत की थी। इसके बाद चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी को नोटिस जारी किया था और जवाब मांगा था। ममता बनर्जी ने चुनाव सभा साम्प्रदायिक आधार पर वोट देने की अपील की थी। उनका कहा था कि मैं अपने अल्पसंख्यक भाइयों और बहनों से निवेदन करती हूं कि शैतानों के कहने पर अल्पसंख्यक वोट को ना बंटने दें। इन लोगों ने बीजेपी से पैसा लिया है। वह सांप्रदायिक बयान देते हैं। हिंदू-मुसलमान के बीच फसाद करवाते हैं। बीआईपी और सीपीएम के लोग बीजेपी का दिया हुआ पैसा लेकर घूम रहे हैं। ताकि अल्पसंख्यक वोट को तोड़ा जा सके।
इसी बयान के आधार पर चुनाव आयोग ने उन पर चौबीस घण्टे का बैन लगाया था। ममता बनर्जी ने अपनी गलती मानने की जगह अब चुनाव आयोग पर ही हमला बोला था। उनका कहना था कि चुनाव आयोग का निर्णय अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक है। मतलब मजहब के आधार पर वोट मांगना लोकतकन्त्रिक व संवैधानिक है। ऐसे बयान संविधान की मर्यादा के प्रतिकूल है। संविधान की भावना के अनुसार जाती धर्म मजहब के आधार पर वोट मांगना गलत है। ममता बनर्जी एनडीए से अलग होने के बाद इस प्रकार की ही राजनीति कर रही है। उन्हें मजहब के नाम पर खुलेआम वोट मांगने में कुछ भी गलत नजर नहीं आता। चुनाव आयोग के नोटिस पर उनका जबाब इसी मानसिकता के अनुरूप था। उनका कहना था कि यदि ऐसी दस नोटिस भी जारी हो जाएं तो कोई बड़ी बात नहीं है।  मैं सभी से एकजुट होकर वोट करने के लिए कह रही हूं,ताकि कोई बांट ना सके मैं हिंदू, मुस्लिम,सिख, ईसाई और यहां तक कि आदिवासियों के साथ भी हूं। ममता का यह कहना भी गलत था। उनको नोटिस तो मुसलमानों से एक जुट तृणमूल कॉंग्रेस को वोट देने की अपील के कारण मिला था। जबकि जबाब में वह हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आदिवासी एकता पर ज्ञान बताने लगी। उनके जबाब का चुनाव आयोग की नोटिस से कोई संबन्ध नहीं है। इसी लिए चुनाव आयोग ने उनके जवाब को तथ्यात्मक तौर पर गलत बताया है। कहा कि उनके जबाब से संबंधित कोई भी सबूत नहीं हैं। वह मुसलमानों से एकजुट होकर वोट देने की अपील कर रही थी। इसका प्रमाण है। इसमें हिन्दू मुस्लिम एकता,लोकतंत्र व संविधान के सम्मान का कोई भाव ही नहीं है। चुनाव आयोग ने कहा कि ममता बनर्जी ने आदर्श चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन किया है। उन्होंने ऐसे भड़काऊ बयान दिए, जिनसे कानून व्यवस्था खराब हो सकती थी। और चुनावी प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है। जाहिर है कि चुनाव आयोग का निर्णय तथ्यों पर आधारित था। उसने अपनी जिम्मेदारी का उचित निर्वाह किया। ममता बनर्जी ने सेंट्रल फोर्स को घेरने के लिए भी उन्होंने लोगों को उकसाया था। वह चुनाव आयोग पर लगातार निशाना लगा रही थी।
ये बात अलग है कि चुनाव आयोग के विरुद्ध ममता बनर्जी ने करीब साढ़े तीन घंटे बाद अपना धरना अचानक खत्म कर दिया। कोलकाता के धर्मतल्ला में स्थित महात्मा गांधी की मूर्ति के सामने धरने पर बैठी थी।  ममता बनर्जी ने जहां धरना दिया,वह क्षेत्र भारतीय सेना के अधीन है। नियमानुसार ममता बनर्जी ने पूर्वी कमान की अनुमति नहीं ली थी। ममता ने धरनास्थल पर एक पेंटिंग भी बनाई और लोगों को दिखाया था। वह अकेले बैठकर धरना दे रही थीं। कुछ दूरी पर उनकी पार्टी के कार्यकर्ता बड़ी संख्या में एकत्र थे। ये लोग लोकतंत्र के लिए काला दिन का बैनर लहरा रहे थे। इनके अनुसार मजहब के आधार पर वोट मांगना लोकतंत्र के लिए अच्छा था।

( उपर्युक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। आवश्यक नहीं है कि इन विचारों से आईपीएन भी सहमत हो। )

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